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Hymn No. 802 | Date: 26-Feb-1999
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नजर-नजर का भेद है, इस सारे जहाँ में मन का खेल है ।
नजर-नजर का भेद है, इस सारे जहाँ में मन का खेल है ।
ध्यान जब खुद पे आया, बंद पाया तन की जेल में ।
सीधे सरल जीवन में, सब कुछ माया का खेल है ।
जग में कोई भटका हुआ है, कोई अटका हुआ है ।
सारे के सारे जकड़े हुये हैं अपनी हदो में बेबस है मन की मान्यताओं के आगे ।
दिल की कोई सुनता नहीं, दिलदार को कोई पूछता नहीं ।
मजहब के आगे कोई किसी की सुनता नहीं ।
परम पिता को चुनवा रखा है ऊँची दीवालों में बुत अबुत बनाके ।
तोड़ना होगा अपने आपके दंभ को, होम करना पड़ चाहे तन को ।
जितना सीधा-सरल है वो, उतना निर्मल निश्चल बनना पड़ेगा ।
कोई रोक-टोक न है उसके पास जाने के लिये कोई एक निश्चित नियम न है।
राह है हजार हर इक जाती है दिल की गलियाँ रे से उसकी ओर ।
- डॉ.संतोष सिंह
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