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Hymn No. 815 | Date: 04-Mar-1999
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नैनों की भाषा है तेरी अबूझ, समझने के चक्कर में बन जाती है पहेली ।
नैनों की भाषा है तेरी अबूझ, समझने के चक्कर में बन जाती है पहेली ।
निकला था मैं तुझे बनाने अपनी सहेली, आ गयी कहाँ से बीच में तेरी खुदाई।
तू जो भी है, मतलब न है हमें, प्यार तुझसे पहले भी था आज भी है ।
सच कहता हूँ सनम, प्यार करता हूँ तुझसे बहुत, आह निकलती है याद आने पे तेरी ।
न देखा था तब भी तुझसे प्यार था, अब तो बेकरार हो चुका हूँ तेरे लिये ।
सनम कसम न देता हूँ तुझे, प्यार से पुकारता हूँ प्यार पाने के लिये ।
बेवफा हम है तो, तू भी कम नहीं, मौका पाते ही भुलाया है तूने हमें ।
शिद्दत से तेरे आने का इंतजार किया, तेरे प्यार के सिवाय कुछ न चाहिये हमें।
- डॉ.संतोष सिंह
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