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Hymn No. 817 | Date: 05-Mar-1999
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जीतने न आया हूँ इस दुनिया को, मैं तो प्यार का मुसाफिर हूँ ।
जीतने न आया हूँ इस दुनिया को, मैं तो प्यार का मुसाफिर हूँ ।
सौदागर न हूँ कि कुछ बेचूं-खरीदूँ, मैं तो प्यार का पुजारी हूँ ।
किसी से खेल खेलना न है मुझे, मैं तो प्यार का अफसाना हूँ ।
धर्म होंगे हजार मतलब न है मुझे इनसे, मैं तो प्यार का दीवाना हूँ ।
किसी नियम कानून से वास्ता न है मेरा, मैं तो बस प्यार को हूँ जानता ।
बंध नहीं सकता किसी इक देश की सीमा में, धडकता हूँ हर दिल में प्यार बनके ।
माफ करना मेरी इस आदत को, आदत नहीं ये है मेरा स्वभाव ।
आनंद की धरा से आया हूँ, प्यार करने इस जहाँ को ।
प्यार में है सब कुछ, प्यार के सिवाय कुछ न सूझता मुझे ।
प्यार में है सब कुछ व्यवहारिक, अव्यवहारिक न कुछ इस संसार में ।


- डॉ.संतोष सिंह