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Hymn No. 833 | Date: 09-Mar-1999
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दिल मान चुका है तुझे अपना, मंजूर नहीं, अब उसे कोई और।
दिल मान चुका है तुझे अपना, मंजूर नहीं, अब उसे कोई और।
बस गयी तसवीर जो तेरी, फनाह होता रहेगा जिस्म कई बार मिटाये न मिटेगी सूरत तेरी ।
कोई नगमा न सुना रहा हूँ तुझे, सच्चाई बयाँ कर रहा हूँ दिल की ।
जीवन जब तक जीऊँगा, तेरे नाम का सिंदूर भर लूंगा तन-मन में मेरे ।
जहर भी पीना पड़ेगा तो पी जाऊँगा बस हो नजरों के सामने तू मेरे ।
अंदाज लगा नहीं सकता तू मेरे प्यार का, इतनी दिल की गहराई में बंद है तू मेरी ।
पता नहीं मुझको प्यार मैं तुझे कितना करता हूँ, जब आंख बंद हो या खुली दीदार तेरा करता हूँ ।
हर पल वो सालता है, जब तुझे मै हूँ भूलता ।
जीने-मरने का हर भेद जाता है मिट, जब तक है तू याद रहता ।
कहता नहीं मैं किसीसे, पर प्रभु तू याद रहता है मुझे हर पल ।


- डॉ.संतोष सिंह