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Hymn No. 837 | Date: 11-Mar-1999
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न जाने कैसे-कैसे लोग आते है पास तेरे ।
न जाने कैसे-कैसे लोग आते है पास तेरे ।
अमृत भरी मुस्कान लेके, तू स्वागत करता है सबका ।
चित्त के सारे भावों से ऊपर, बरसाता सबपे अपना प्रेम ।
मानव धर्म निभाना कोई तुझसे सीखे, रत्नो की खान है तू।
तेरी कृपा है जो करीब बुलाया हमको अपने ।
सबकी व्य़था सुनता बिना व्यथित हुये, हर लेता हर व्यथा को ।
एक बार नहीं कई बार आया तू बदल-बदलके रूप ।
जिसको तूने चाहा, वही तुझे पहचान पाया ।
बीता है जीवन कर्म करते हुये, तेरे पास आके तो कुछ जान पाया ।
जीवन का धर्म निभाना तूने सिखाया, तेरी कृपा से बढ़ते रहेंगे हम ।
- डॉ.संतोष सिंह
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