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Hymn No. 84 | Date: 02-Mar-1997
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तेरी यादों के सहारे जीते है हर पल,
तेरी यादों के सहारे जीते है हर पल,
भीगे नैनों को इंतजार है तेरा हर पल ।
चौंक जाता है मन मेरा देहरी पे हुयी हर आहट पे,
तू न आ सकें तो कम से कम मुझे ही बुलवा ले ।
ना समझ मेरा मन है, समझदार तू कम तो नहीं;
तेरी महान सृष्टि का एक क्षुद्र हिस्सा हूँ मैं ।
मुझको तो कुछ पता नहीं है तेरे नाम के सिवाय ;
लोगों से सुन – सुनके प्रीत मैंने तुझसे कर ली है ।
कैसा भी हूँ मैं; शायद एक तरफा हो प्यार मेरा ;
तू चाहे या न चाहें मेरा दम टूटेगा तेरी ही आगोश में ।


- डॉ.संतोष सिंह