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Hymn No. 842 | Date: 12-Mar-1999
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आशिकी का रोग लगाया तूने, निभाना होगा प्यार के रिश्ते को ।
आशिकी का रोग लगाया तूने, निभाना होगा प्यार के रिश्ते को ।
दान जो पकड़ा है तेरा, न छोड़ने के लिये ।
सिंदूर से भर रखा है रोम-रोम मेरा, तू ही तो है मेरा प्राणनाथ ।
युँही तुझे न जाने देंगे जीवन से अपने कई जनमों तक लेंगे तेरा नाम हम ।
जुड चुका है मेरा दिल तुझसे, दूर होने का न कोई है सवाल ।
मन का कोई दोष न है, वो तो आगे-पीछे रहता है तेरे ।
बंसी बजा रहा हूँ खुशी में, जैसे-जैसे करीब आ रही है तेरे आने की घडी ।
ऐतबार कैसे करेगा तू, प्यार के जोर में खुदको भूला रहेगा ।
ऐ मेरे प्राणो के नाथ बता दे तू मुझे, क्या अब कोई कोर-कसर बाकी है ।
शरारत न करना तू मुझसे, आहत होगा दिल तो प्राण दे देगा चरणों में तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह