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Hymn No. 848 | Date: 14-Mar-1999
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मत पुछो देवेन्द्र हाल क्या होता है हमारा, निमग्न रहता है तू तो आनंद में ।
मत पुछो देवेन्द्र हाल क्या होता है हमारा, निमग्न रहता है तू तो आनंद में ।
संलग्न होते हुये न हो पाते है तुझसे, बेहाल हो जाता है जीवन हमारा ।
एक नहीं, दो नहीं, कई-कई बार च्युत हुये हम बतायी हुयी तेरी राहों से ।
ऐ परमपिता तू न रख कोई रंज हमसे, उंगली पकडके चलना सिखाया ।
शर्म आती है अपनी करनी पे तेरा निर्मल प्यार देखके झुक जाती हैं निगाहें ।
प्रभु आहें भरता हूँ न डरके, तुझसे दूर होने के ख्याल से ।
मुझे कुछ न देना, जो चाहे हो हमारे कर्मो की सजा वो तू दे देना ।
पर तेरे सानिध्य से न दूर करना, रखना सदा हमे अपने करीब तू ।


- डॉ.संतोष सिंह