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Hymn No. 851 | Date: 15-Mar-1999
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सदगुरु ही सर्वोपरि है, उसका मिलना है जीवन का चरमोत्कर्ष ।
सदगुरु ही सर्वोपरि है, उसका मिलना है जीवन का चरमोत्कर्ष ।
सबसे बड़ा कर्म है सदगुरु के चरणों में रहके करना उसकी सेवा ।
उसके बताये हुये कार्यो को दिल लगाके अंजाम देना ।
अपने मन की न कभी सुनना, आंखे मूंदके उसके बताये पथ पर चलना ।
सदगुरु है धर्म से ऊपर, आडे न आने देना तेरे उसके बीच में इसको ।
लगन रखना सदा उसमें, हो जायेगा मगन तू खुद ब खुद उसमें ।
इस धरा पे साक्षात ईश्वर का रूप है वो, हर कहना मानते ईश्वर उसकी
कभी लगाना पडा बाजी प्राणों की, बिना सोचे लगा देना ।
ज्ञान से परे है सदा प्रेम के वश में है रहता ।
मुस्कराना घोतक है जानने का, प्रयास मत करना मापने का ।
- डॉ.संतोष सिंह
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