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Hymn No. 852 | Date: 15-Mar-1999
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लीला अनेक है तेरी, समझ नहीं पाते हम मूरख उसको ।
लीला अनेक है तेरी, समझ नहीं पाते हम मूरख उसको ।
प्यारे पिता माफ करना हमारे क्षुद्र विचारों के लिये ।
अज्ञानी है हम, चूकते नहीं शेखी बघारने से अनजाने में ।
दूर तक वास्ता न है अच्छे कर्मो से, धर्म को न जाना कभी ।
मन की अंधियारी गलियों में गोता लगाया सदा, तुझको क्याँ पहचानेगे ।
मत उलझा हमें अब और, कर्मो के चक्रव्यूह में फँसे है ।
उद्धार होना लिखा है तेरे हाथों से, कब कैसे सब तू जाने ।
रब डुबा दे तेरे प्यार में हमको इतना, समझ मिट जाये हमारी ।
जानना न तुझे है न खुदको, डूबना चाहते हैं तेरे प्यार में ।
बावरा बन गा वो भी अच्छा है, कम से कम प्यार तो कर सका तुझको ।


- डॉ.संतोष सिंह