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Hymn No. 86 | Date: 06-Mar-1997
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गुनगुनाते है हम तो तेरे ही शब्दों को ।
गुनगुनाते है हम तो तेरे ही शब्दों को ।
क्या है मेरा, सब कुछ तो है तेरा ।
तुझसे ही पाया तुझको ही किया अर्पित ।
अब किस बात का परदा जो तूने, चाहा वो मैंने किया ।
बनाना बिगाडना ये सब तो है तेरे हाथों का खेल
किस बात का रोना सब कुछ छोड देना है तेरे हाथो में ।
दूसरों मे कमियों को क्यों ढूंढ़ना, ना कोई इंसान बिन कमियों का।
अपने कमियों को पहले है ढुंढ़ना, उनसे नाता तोड़ लेना है सदा के लिये ।
प्रभु के प्यारे हम सभी है, फिर आपस में क्यों भेद रखना ।
निगाहो से है बस परदा उठना, प्रभु तो है कण – कण में समाये ।


- डॉ.संतोष सिंह