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Hymn No. 867 | Date: 20-Mar-1999
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मचलने से खुद को रोक नहीं पाता हूँ जब याद आ जाती है तेरी दिल को।
मचलने से खुद को रोक नहीं पाता हूँ जब याद आ जाती है तेरी दिल को।
तुझसे दूर जाना मेरे बसकी बात नहीं, गुनगुनाना सुनके तेरी और खिंचा चला आता हूँ ।
रिश्ता तेरा मेरा अनोखा है, उचित न होगा प्यार के सिवाय कोई और नाम लेना ।
जनम-जनम से तू है हमारा, बिछुड़के हर बार पास अपने तूने बुलाया है हमको
दिल लगाया है किसी से तो तेरे सिवाय किसी और से न कभी ।
बहके हुये मन को तू न देख नाथ ले तेरे नजरों के ठौर से उसे ।
जोर चलता है बहुतों का बहुत बार, पर तेरे पास पहूँचता है हर बार ।
बस जाना चाहता हूँ तेरे दरबार में सदा के वास्ते बनके मुलाजिम तेरा ।
डेरा जमाया हूँ जहाँ में जहा से उखाडके आना-जाना चाहता हूँ पास तेरे ।
रह लूंगा बनके दास तेरे पास मुझे न बनना दुनिया में किसीका बॉस ।
- डॉ.संतोष सिंह
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जालिम इल्जाम देना है आसान, प्यार करके निभाना बड़ा मुश्किल ।
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