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Hymn No. 871 | Date: 01-Jan-1900
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मंजिल दूर है तो गम नहीं, राह में जो तू है हमारे संग ।
मंजिल दूर है तो गम नहीं, राह में जो तू है हमारे संग ।
कितना भी कमजोर हूँ तो क्या से, हाथो में हाथ है तेरा तो कम नहीं किसीसे।
गिला न है किसीसे जो भी गिला थी खुद से, दूर होती जा रही है तेरी कृपासे।
गम छू नहीं पाता मन को ज्यों- ज्यों प्यार बढता जा रहा है तुझसे ।
दर्द भी रुला नहीं पाता रुलाई आती है तुझसे जुदा रहने पे ।
बोहाली में भी मनाता हूँ मौंज प्रभू तेरी बातें सोच -सोच के ।
खोज हो गयी है खत्म, मिले हुये को संजोना चाहता हूँ प्यार से ।
बेबात कुछ नहीं होता, हर बात का मतलब होता है प्रभू के प्यार में ।
सिलसिला चलता रहा इस प्यार भरी आंख-मिचौली के खेल का ।
खेल का अंत चाहता हूँ प्रभू अपने आपको हार जाऊँ हाथो तो तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह