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Hymn No. 884 | Date: 26-Mar-1999
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सीखा दे हमे तू तोड़ना, मन के चक्रव्यूह को ।
सीखा दे हमे तू तोड़ना, मन के चक्रव्यूह को ।
जंग चलती रहती है हमारी, दुनिया के मायावी पहलू से ।
कमजोर न हैं हम इतने, धोखा खाते है मन के करतूतों से ।
तेरा साथ जो मिला, कुंद कर देते है माया के हथियारों को ।
पीछे हटना हमें आता नहीं, वख्त पड़ने पे जान देके कीमत चुकायेंगे ।
आये राह में कोई अब और कठिनाई, तेरा नाम लेके पार कर जायेंगे ।
हाथों में है तेरे मन को नाथना हमारे ।
सहारा चाहते है तेरा, न किसी और के आसरे रहना है चाहते ।
हम तो प्यार के साथ सब कुछ अर्पित कर चुके है तुझे ।
खाबों-ख्यालों में जीते है संग तेरे, हकीकत में खोजते है तुझको अपने पास ।
- डॉ.संतोष सिंह
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