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Hymn No. 886 | Date: 27-Mar-1999
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भेद न कोई मन में, हम देखते हैं तुझे सबमें ।
भेद न कोई मन में, हम देखते हैं तुझे सबमें ।
सोया हुआ था न जाने कब से, जगाया तूने प्यार भरे बोलो से ।
दामन में तेरे जो सर टिकाया, प्यार ही प्यार भरा पाया ।
आशिकी क्या है न जानते थे कभी, रोग लगा आके करीब तेरे ।
उमंगो से भर जाता हूँ, निगाहो से तेरे आशीकी का जाम पीते ही ।
जो जीवन रोता था उसमें प्यार की बहार आ गयी तेरे आने से ।
मचल उठता है दिल तेरे होठो की मुस्कान देखके ।
होश में न रहता हूँ, अमृतमय स्वर गूंजते है भीतर ।
कुछ कहने करने से अच्छा है, निहारते बैठुं अपलक तुझे ।
छूट गया है साथ सबका, जो करीब तू आ गया ।


- डॉ.संतोष सिंह