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Hymn No. 90 | Date: 20-Mar-1997
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खाते है कसमें झूठी तेरी ; तेरे घर में रहके रखते है बैर तुझसे ।
खाते है कसमें झूठी तेरी ; तेरे घर में रहके रखते है बैर तुझसे ।
अपनी एक गलती को ढकना चाहते है अपने ही हजार झूठों से ।
तुझसे वादा करके भी वादा खिलाफी करते है हर बार ।
मन के संग उडते है इस जगत में गिरने पर याद आती है तेरी ।
जोश में होश खो के घमंड के साथ रहते है ।
सर फोड़ी करते है अपने ही लोगों से;
ईर्ष्या के चलते खैर रखते है लोगों से, गुजर जाने पे उम्र, याद करते है तुझको ।
बेबस मन असहाय तन अविश्वास का संग ले खुद को तुझसे दूर कर लेते है ।
मंजिल नजर आने पर भी हो जाते है दूर मंजिल से अपनी गलत आदतों के चलते ।
जिंदगी को सत्य मानके मृत्यु से डरते है भ्रमित मन के कारण ।
कुर्बान कर देना है सब कुछ तुझपेआज नहीं तो कल तेरे पास जाना है ।


- डॉ.संतोष सिंह