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Hymn No. 910 | Date: 02-Apr-1999
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मुझे नहीं जाना उन गलियों में, जहाँ तेरे कदमों की छाप न हो ।
मुझे नहीं जाना उन गलियों में, जहाँ तेरे कदमों की छाप न हो ।
मुझे नहीं जाना उस दर पे, जहां तेरा कभी वास न रहा हो ।
मुझे नहीं मिलना उस शख्स से, जिसे देखके तुझे याद न कर पाऊं ।
मुझे नहीं चाहिये समझ, मैं तो तेरे प्रेम में बावरा होना चाहूँ ।
मुझे नहीं करनी कोई फरियाद, मैं तो तेरे यादो में गुम हो जाना चाहूँ ।
मुझे नहीं देखनी दर्पण में सूरत अपनी, जो अलग बताये मुझको तुझसे ।
मुझे नहीं लेना है श्वासों को, जो आडे आती हैं हमारे मधुर मिलन में ।
मुझे नहीं बनना कुछ भी, जो तू चाहे वो बनके आऊं तेरे चरणों में ।
मुझे नहीं चाहिये गम और खुशी, यूँ ही पड़ा रहूँ कदमो में तेरे ।
मुझे मंजूर है वो सब कुछ, जिसमें हो तेरी सहमति न मेरी अहमियत ।


- डॉ.संतोष सिंह