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Hymn No. 914 | Date: 03-Apr-1999
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हर रात मुलाकात होती है ख्वाबों में, दिन को ये बात क्यों नहीं बनती ।
हर रात मुलाकात होती है ख्वाबों में, दिन को ये बात क्यों नहीं बनती ।
दिल में ऐसा कौन सा फर्क आ जाता है, जो दिन को रात में बदल नहीं पाता ।
कसमें खाता है तू रात को, प्यार में सदा साथ निभाने का ।
दिन होते ही क्या दिल हमारा है बदल जाता जो तुझे अपने पास नहीं पाता ।
समझ नहीं पाता हूं, नींदो में क्यों जगाता है आके तू हमें ।
जब हम परवाह न करते जमाने की, तो तू क्यों छुप-छुपाके है आता ।
अंजाम प्यार में तेरे जो भी होगा, देखा जायेगा सीखा हमने तुझसे ।
प्यार करने से पहले था सोचना, तडपना प्यार में जुर्म है सबसे बड़ा ।
दादागीरी चलेगी नहीं हर जगह तेरी, करनी पड़ेगी कबूल सजा तुझे मेरी ।
आजीवन कारावास की सजा देता हूँ तुझे, बंद रहना होगा दिल में मेरे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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