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Hymn No. 916 | Date: 03-Apr-1999
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बनते देखा, बिगड़ते देखा, तेरे हक में सब कुछ बदलते देखा ।
बनते देखा, बिगड़ते देखा, तेरे हक में सब कुछ बदलते देखा ।
समझ न पाया कुछ, अपने आपको तेरे रूप में ढलते देखा ।
अंधकारमय हो या प्रकाशमय, ताना-बाना है विचारो का ।
सारे स्वरूपों को एक-एक करके मिटते देखा, जो गवाह थे तेरे उनको भी रूप बदलते देखा ।
हर सवालो का अंत उत्तर में देखा, हर उत्तर से एक नये सवाल का जन्म होते देखा ।
सत्य-झूठ है मन का खेल, जो बंधा है नियमो से ।
एक का हित झूठ, बहुसंख्य का अहित सत्य होते देखा ।
माने या न माने खरा सत्य में हर एक को स्वरूप बदलते देखा ।
उपजता है सब कुछ नियमो के तहत, हर नियम को बनते बिगडते देखा ।
बेमानी है तेरा ये खेल, खेलो चाहे किसी ओर से सबक तो एक ही देखा ।
आगे-पीछे की है रेलम-पेल, शुरूआत कहीं से कर लो कोई अर्थ नहीं ।
ज्ञानी हो या प्रेमी, योगी हो या कर्मी, सबको एक जगह मिलते देखा ।
- डॉ.संतोष सिंह
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