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Hymn No. 932 | Date: 07-Apr-1999
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अनजान हूँ जीवन की बहुत पहलुओं से, पर्त दर पर्त उघड़ती जा रही है हर पर्त ।
अनजान हूँ जीवन की बहुत पहलुओं से, पर्त दर पर्त उघड़ती जा रही है हर पर्त ।
सोंचा न था जिनके बारे में, आश्चर्य से भर जाता हूँ देखके उनके अर्थो को ।
सही मायने में कुछ नहीं होता, महत्वपूर्ण अमहत्वपूर्ण में किंचित माया का भेद नहीं रहता ।
इन सबमें रहके तू इनसे दूर कहीं बहुत है, खोजना पड़ता है अपने आप में तुझको।
जो समझ न पाया था कितने जन्मों से, वो तेरे प्यार ने समझा दिया।
यार तूने कमाल कर दिया, गीतों में जीवन के रहस्यों को बयाँ कर गया ।
हमने तो एक राह के बारे में सोचा था, ध्यान से देखा तो हर राह जा रही थी तेरी ओर ।
जीवन को ख्वाब में बदलते देखा, सारे के सारे महत्वो को मिटते देखा ।
जो सहज सरल अनजाने में प्राप्त था, उसको निर्गुण निराकार में बदलते
देखा ।
जो सोचा था वो भी होने लगा, धीरे-धीरे दिल में वो आत्मसात होने लगा ।


- डॉ.संतोष सिंह