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Hymn No. 937 | Date: 07-Apr-1999
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क्या कहके पुकारूँ मैं तुझे समझ न पाऊं ।
क्या कहके पुकारूँ मैं तुझे समझ न पाऊं ।
अनोखा है मेल तू कभी कृष्ण लगे कभी राम ।
मेरे कृपानिधान, समझने लगे हैं लोग मुझे बावरा ।
संवरना न चाहूँ ओ मेरे साँवरे, मगन हो जाऊं तुझमें ।
कसम खुदा की तेरे प्यार में बावरा हो चुका हूँ ।
बेअसर है दुनिया भर की बात जो तू है साथ ।
रात दिन को पहचान न पाऊं, नजरों में है छवि तेरी ।
ऐ... भोले मोह लेता है तू हमें अपनी सावली सूरत से ।
रही सही कसर निकाल लेती है आधी-अधुरी मुस्कान तेरी ।
जान का मोह टूट जाता है तेरे मोह में भूलाके सब कुछ ।


- डॉ.संतोष सिंह