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Hymn No. 945 | Date: 09-Mar-1999
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देखके तो साक्षात मुर्त रूप में, दंग रह गया मैं ।
देखके तो साक्षात मुर्त रूप में, दंग रह गया मैं ।
दिल का इक-इक कोना कली से, फूल बन गया ।
सोचा न था, अनायास तुझको पा जाऊंगा मैं ।
जिसके लिये भटकते थे लोग, अनयास मेरे हाँथ आ गया ।
अब तो गुजारीश करता हूँ तुझसे, भर ले मुझे झोली में अपनी ।
खिल उठा है दिल में तेरे प्यार का फूल, मुरझाने न देना तु उसे ।
समझना कुछ नहीं चाहता हूँ, पास रहना तेरे चाहता हूँ ।
कुछ न है पास मेरे देने के लिये, जो कुछ मेरा लगे तू ले लेना उसे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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