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Hymn No. 962 | Date: 13-Apr-1999
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मेरे प्रभु के एक से एक भगत, इनके आगे सूरज-चांद की कोई बिसात नहीं ।
मेरे प्रभु के एक से एक भगत, इनके आगे सूरज-चांद की कोई बिसात नहीं ।
सीख मिलती है बहुत कुछ उनसे, कृत कृत्य हो जाता है तन मेरा साथ पाके उनका ।
प्रेम की कोई साक्षात मूरत, जब भी छेडे तराने, दौड लगानी पड़ती है उनकी ओर प्रभु को ।
कर्म की है कोई साक्षात मूरत, रमे रहते हर पल प्रभु में करते हुये अपने कर्म सारे ।
सत्य और उनमें कोई भेद न कर पाये, जो दिल में रहता है उनके, वही कहते है बिना डरे ।
लाभ-हानि के विचारों से दूर, हर पल मगन उसमें, करते अपने दैनंदिन कर्मो को
दया की मूरत है वे, टपकती करुणा उनके ख्यालों में खोये करती पालन सबका।
जीत ले जो सबके हृदय को अपनी मुस्कान और कर्मो से जपते हमारे परम, प्रिय को वो ।
भोली-भाली है सबसे, अनिद्य सुंदरता की देवी, समझने की कोई चेष्टा नहीं , रत है वे सदा प्रभु में ।
इन सबके बीच अदना सा मैं, सौभाग्य दिया प्रभु ने इनकी सेवा कर बनने को चरणों की धूल ।
- डॉ.संतोष सिंह
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