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Hymn No. 965 | Date: 13-Apr-1999
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तेरे दायरे में थे न जाने कब से, शर्मा गये देखके तेरी विशालता ।
तेरे दायरे में थे न जाने कब से, शर्मा गये देखके तेरी विशालता ।
जानते हुये सब कुछ प्यार दिया तूने अपना, अहसास न होने दिया ।
सताये हुये थे अपने आपके, शरण पाते ही भूला गया अपने आपको ।
करुणा का तू अवतार है, हर पल करते है तुझको नमस्कार ।
अभिभूत हो जाते हैं देखके तुझे, तेरा नाम लेते आ जाती है मस्ती ।
देखा जाये तो कुछ भी न था, फिर भी दिया तूने सब कुछ अपना ।
एक से एक रत्न थे तेरी महफिल में, इस पत्थर को भी स्थान दिया तूने ।
अब दे दे थोड़ी सी आशीश कैसे भी करके सीख जाऊं तेरा कहाँ करना ।
मरना तो तय है आज नहीं तो कल, मरना चाहूँ प्रभु तेरी गोद में ।
भाव में आके बक देता हूँ बडी-बडी, लायक बना दे प्रभु तेरी कृपा से ।


- डॉ.संतोष सिंह