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Hymn No. 973 | Date: 14-Apr-1999
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मिटने को मिटती है, इक बार तो पत्थर की लकीर ।
मिटने को मिटती है, इक बार तो पत्थर की लकीर ।
मिटती नहीं सदगुरु की कही बात कभी ।
जडता के है शिकार, संसार के सारे नियम ।
सदगुरु के नियम ढलते है जीवन के अनुरूप ।
मापी जा सकती है इक बार को सूरज की गर्मी ।
पर सदगुरु की महिमा को बयाँ करना है मुश्किल ।
जोर चलता नहीं माया के शिकार हृदय पे किसीका ।
उसकी निगाह झकझोर जाती है हमारे रोम-रोम को आनंद से ।
निश्चित न है कहना कुछ भी सदगुरु के लिये ।
प्यार किया जिसने जीते जी जान लिया उसने ।


- डॉ.संतोष सिंह