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Hymn No. 981 | Date: 17-Apr-1999
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समझ न पाओगे जितना समझने जाओगे, उतना उलझते जाओगे ।
समझ न पाओगे जितना समझने जाओगे, उतना उलझते जाओगे ।
प्यार कर लो इक बार उससे, बिन कहे सब समझ जाओगे ।
हर भेद उसका तुम्हारा होगा करने न करने से परे रमते रहोगे तुम उसमें ।
कौन किसमें है भेद करना होगा मुश्किल, सागर में बूंद बूंद में सागर ।
जीवन और मौत का कोई मतलब रह न जाता, आनंद को सर्वत्र पाओगे ।
भूख, प्यास, चिंता, द्वेष, अपना-पराया प्यार घटित होके न घटेंगे तुममें ।
तुम तो मौज करोंगे आनंद की मौजो पे, निर्गुण होंगे उसके संग ।
प्यार कह लो या आनंद, निज आनंद से निरानन्द सब होता है महामिलन में।
मायने कुछ भी न रहता वहा पे, जो शब्द रास आ जाये व्यक्त करने को ।
अव्यक्त को व्यक्त करने में असमर्थ है, ये तो अनुभूति की बात है ।


- डॉ.संतोष सिंह