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Hymn No. 987 | Date: 19-Apr-1999
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यात्रा जो शुरु की है पिता हाथ पकड के तेरी ।
यात्रा जो शुरु की है पिता हाथ पकड के तेरी ।
साथ छूटने न देना तू कभी बीच राह में ।
रुकावटे आयेंगी हजारों, पार कर जायेंगे विश्वास से ।
कृपा होगी तेरी हम पे, निर्बाध गति से बढ़ते जायेगे ।
नौसीखियापन की बात न है, मनमानी है मन की ।
जो सोचा न था वो करके पैदा करते हैं मुश्किलें ।
बहुत डर लिया, तेरा प्रेम देखके दिल आ गया ।
जो होना होगा होता रहेगा, हम तेरे संग चलके रहेंगे ।
वो फूल क्या सुंदर है, जिसमें काटे न हो ।
वो राह क्या जिसमें बाधायें न हो ।
हम जो चल पड़े तेरी ओर मुश्किल है रुकना ।
भटकते रहेंगे बार-बार, बढ़ते रहेगे तेरी ओर ।


- डॉ.संतोष सिंह