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Hymn No. 992 | Date: 20-Apr-1999
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बे अर्थ सा लगता है जीवन, तेरे प्यार के बिना ।
बे अर्थ सा लगता है जीवन, तेरे प्यार के बिना ।
दिल को कुछ रुचता नहीं, जहाँ तेरा अहसास न हो ।
मन भी मनमानी करता है, अब तेरा संग पाने के लिये ।
दिल को छोड़ तन को भी अजीब सुकून मिलता है तेरा साथ पाते ही ।
जताने से न हूँ डरता, माता-पिता के रिश्ते लगते है बेमतलब से ।
कहता हूँ प्रिय तुझसे, धर्मपत्नी में भी अब दिल न हैं लगता ।
जब तू दूर है रहता, दिल निर्मल निश्चल प्यार है खोजता ।
न कुछ सोचा समझा हुआ, बालकों के संग खेलने को दिल है करता ।
चोट खाता हूँ तन पे कई-कई बार, लिपट पड़ने का मन है करता ।
मत पूछ तू हमसे दिल में बचा न है अब कुछ तेरे सिवाय ।


- डॉ.संतोष सिंह