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Hymn No. 996 | Date: 21-Apr-1999
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छीनने को छीन लेना मुझसे तू सब कुछ, मन में उफ न करेंगे हम ।
छीनने को छीन लेना मुझसे तू सब कुछ, मन में उफ न करेंगे हम ।
माता-पिता, बंधु-सखा, जो तू चाहे वो छीन लेना, मुझसे मुख न मोड़ना ।
घर-बार हो या धन-धाम जो तू चाहे वो छीन लेना, न ठुकराना प्यार को हमारे।
एक बार नहीं, कई बार छीन लेना तन का प्राण, दिल में जली ज्योत को बुझने न देना ।
कष्ट देना तन-मन को बारंबार, प्यार की राह से डिगने न देना हमको ।
मैं से जुड़ा हो जो वो तू छीन लेना, तेरी प्यार को पाने के लिये तेरी राह पे चलने को तैयार हूँ ।
बे अर्थ है मेरे लिए सबकुछ, जिन में से तेरे प्यार की खूश्बू न आती है ।
मत छीनना हमसे कभी तेरी यादें, जिनके सहारे हम है जीते ।
छीनना न तू हमसे कभी तेरी मुलाकाते, दिमाग जिनके ख्वाब देखते थे न जाने कितने जन्मों से ।
छीनना न तू हमसे कभी, तेरी शाश्वत प्यार को जो तेरी कृपा से मिला है हमको ।


- डॉ.संतोष सिंह