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Hymn No. 999 | Date: 22-Apr-1999
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प्रभु देना जो भी तू सजा, रहना सदा साथ हमारे ।
प्रभु देना जो भी तू सजा, रहना सदा साथ हमारे ।
सह लेगे दुनिया की सारी सजा, जो तू होगा साथ हमारे ।
कर्मो में इतना लिप्त कब हो जाते हैं, जो बनती है सजा का हेतु ।
सजा से डरते कहता नहीं, दूरियाँ बढ़ जाती है तेरे-मेरे बीच की ।
लालच रह नहीं गया है मन में, विषयो से पीछा छूटता क्यों नहीं ।
दोष तुझे देता नहीं हूँ, चूक कर बैठता हूँ मन के आगे ।
तेरी कृपा पे पानी फेर देता हूँ, शिकस्त खा जाता हूँ माया के खेल में ।
मुझे अपने का डर नहीं, न ही तुझसे फरियाद करता हूँ ।
सोचता हूँ प्रिय दाग तेरे दामन पे न लग जाये ।
प्रभु कमी कहाँ हैं मुझमें, तेरी कृपा से दूर कर दे तू उसे ।


- डॉ.संतोष सिंह