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Hymn No. 1001 | Date: 22-Apr-1999
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कौन किससे खेल खेलता है, खेलते-खेलते बन जाता है जीवन जेल ।
कौन किससे खेल खेलता है, खेलते-खेलते बन जाता है जीवन जेल ।
कभी प्रारब्ध खेलता है, तो कभी ग्रह-नक्षत्र खेलते है ।
अबूझ अनोखे ढंग से खेल खेलते हैं सब मानव के संग ।
धरा पे माया नाच नाचे, बांधके इच्छाओं की डोर से ।
चलता रहता है लोक-परलोक में, तेरा ये अलौकिक खेल ।
खेला जाता है द्वार वो सबके, सजा भी मिलती है उसको ।
वाह रे वाह इसमें कहाँ किसीका दोष, मौका दिया उसने सबको ।
दोष है अकेले उसका, जिसने खुद को तनहा असहाय समझा ।
इक बार ललकार के कह देता, कोई न खेल खेल सकता मेरे संग ।
दंग रह जाता बनानेवाला सामर्थ्य़ देखके, उसको अपना बना लेता ।


- डॉ.संतोष सिंह